खोता हुआ हमारा अस्तित्व

अपूर्बा बी

रिश्तेदार, परिजन, सहपाठियों, अध्यापकों के असंवेदनशील, आक्रमणशील और निर्मम प्रश्न, टिप्पणियां और कसे हुए तंज सुनते सुनते अब कान थक चुके हैं लेकिन हौसले नहीं टूटे।

पहली बार इन्हें सुन कर मेरे मन मे क्रोध की भावनाओं ने जन्म लिया था लेकिन अब ये सब कुछ मेरे लिए हास्यास्पद हो चुका है।

ये सिलसिला तब से शुरू होता है जब 2011 में  मेरी माँ ने इस दुनियां को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। उनके इंतक़ाल की वजह कैंसर थी। तब मैं मात्र चौदह वर्ष की थी और मेरे दसवीं के बोर्ड्स आने वाले थे। माँ के इंतक़ाल से पहले यूं तो हमारे परिवार के हालातों की किसी को चिंता नहीं थी और ना ही खबर। लेकिन उनके जाने के बाद अचानक हर किसी को यह चिंता सताने लगी कि मेरी परवरिश पर क्या असर पड़ेगा। आखिर कौन मुझे “संस्कार” देगा, मेरी शादी कैसे होगी, कही अपने पिता के छत्रछाया में आकर में “लड़कों जैसी” ना हो जाऊं वगेरह वगेरह। हर कोई पिताजी पर दूसरी शादी कर लेने का सुझाव कुछ इस प्रकार बरसा रहे थे जैसे बम्बई की बारिश हो, दोनों ही  रुकने का नाम नहीं लेते हैं। हालांकि इतने दबाव के बावजूद भी उन्होंने  कभी दूसरी शादी करने का  ख्याल भी अपने मन मे लाना ज़रूरी नहीं समझा।

हर किसी की एक ही दलील थी, “मास्टरजी, आपकी ज़रूरते कैसी पूरी होंगी, बच्ची को संस्कार कौन देगा, घर का ख्याल कौन रखेगा”, और उनके “सुझाव” नाजायज़ भी तो नहीं, आखिरकार भारतीय समाज में  एक औरत की हस्ती भी तो ना के  बराबर होती है।

हर किसी की एक ही दलील थी, “मास्टरजी, आपकी ज़रूरते कैसी पूरी होंगी, बच्ची को संस्कार कौन देगा, घर का ख्याल कौन रखेगा”, और उनके “सुझाव” नाजायज़ भी तो नहीं, आखिरकार भारतीय समाज में  एक औरत की हस्ती भी तो ना के  बराबर होती है।  पैदा होते ही पिता की बात मानो , फिर भाई की बात मानो , शादी हो जाने के बाद पति और ससुराल, खास कर सास जो की खुद भी एक औरत है उनकी  बात भी मानो और अपनी दुनिया  छोड़ कर उनकी दुनिया में समा जाओ और अपना अस्तित्व भूल जाओ, बच्चे जब बड़े हो जाये तब उनकी जरूरतो के हिसाब से अपने आप को ढाल लो जिससे उन्हें तुम्हारे  गैर अस्तित्व से  शर्मिंदगी  ना महसूस हो और  फिर एक दिन यू ही किसी रोज़ हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाओ और अगर गलती से भी किसी दिन अपने अस्तित्व के होने को भी याद कर लो तो खत्म कर दिए जाओगे।

हम भारतियों के लिए  हाउसवाइफ शब्द एक बहुत  सीरियस मुद्दा है, वस्तुत: रूप से भी और लाक्षणिक रूप से भी। हमारा ये मानना है कि जब एक औरत की शादी हो जाती है तब उसकी शादी किसी इंसान से नहीं बल्कि एक परिवार से और एक घर से होती है जो कि अंत में  उसे  सिर्फ और सिर्फ एक भोगविलास और दिखावे की वस्तु ही बना कर रख देता है जिसका औहदा उसके शारीरिक स्थिति और गर्भ को ताक़ पर रख कर ही या तो  बढ़ता है या तो घटता है और जब वह उपजाऊ या “दर्शनीय ” नहीं रहती उसे बदल दिया जाता है। एक औरत जन्म के बाद भी अपने घर में  पराये धन की तरह सुशोभित होती है और अपने पति के घर में भी एक किराएदार की भांति ही रहती है जिसे कभी भी निकाला जा सकता है। आभूषण, पैसा और प्रासंगिक रूपी “सम्मान” और “अधिकार” भी जो उसे उसके पति के घर से मिलता है वह भी एक जमाराशि  मात्र होता है,  जैसे अपने घर के अलमारी के किसी कोने में पड़ा कोई पुराना मलमल का कपड़ा हो जिसे कभी-कभार साफ सुथरा करके धूप दिखा कर दुबारा उस ही कोने में पटक दिया जाता है और जब वो कपडा सड़ जाए तब उसे कचरे के डिब्बे में फेंक दिया जाता है जिससे एक नए मलमल के कपड़े के लिए खाली जगह बन जाये।

मैं  इस किस्म की विचारधारा से बिल्कुल ही अपरिचित थी क्योंकि मैंने अपनी माँ को हमेशा एक मनुष्य के रूप में देखा था, क्योंकि वही तो वो थी। मेरे पिताजी भी मेरी माँ से बेहद प्रेम करते थे और पूरे मन से उनका सम्मान करते थे। लेकिन तब मैं पितृसत्ता नामक इस सामाजिक त्रुटि से अनजान थी जिसके लिए स्त्री या तो देवी है नहीं तो पैर की धूल, उसके बीच कुछ भी नहीं।

इस सामाजिक त्रुटि का सामना मुझसे तब हुआ जब कभी मैं अपने पिताजी के साथ किसी  के भी घर  जाया करती थी और उन सभी लोगो का एक ही उपदेश और सवाल होता था कि मेरी माँ का रिप्लेसमेंट( प्रतिस्थापना) कब होगा।

लेकिन मन में  कुछ प्रश्न भी अब सामने आते  है कि ममता जैसी पावन और पवित्र भावना पितृसत्ता और पितृसत्तात्मक विचारधारा से कब जुड़ बैठी? आखिरकार माँ के अभाव से और पिता के प्रभाव से बेटिया कबसे “बिगड़ने” लग गयी? क्या मेरी परिस्थिति और दूसरी “बिन माँ की बेटियों” की परिस्थितियों में कोई खास अंतर है? शायद नहीं।

हमने जब कभी अपने आस पास चीज़ों को बनते-संवरते देखा है उनमें हमारी माँ ओ का बहुत  बड़ा योगदान रहा है।

हमने जब कभी अपने आस पास चीज़ों को बनते-संवरते देखा है उनमें हमारी माँ ओ का बहुत  बड़ा योगदान रहा है। चाहे वो स्कूल की टेक्स्टबुक में लिखी छोटी छोटी बाल कथाएं हो, surf exel का विज्ञापन हो, या बॉलीवुड की फिल्मो में बेटी को “विदा” करती हुई रोती-बिलखती हुई माँ हो। हर जगह सब कुछ बनाती-सवारती माँ ही है, बाप हर वक़्त किसी न किसी कोने में पड़ा चुप-चाप अखबार पढ़ता हुआ ही मिलेगा।

बचपन से ही बच्चियों को रसोई में हाथ बटाने के लिए मौजूद रखना,
भाई की झूठी थाली धोना सीखाना,
परिवार में मौजूद पुरूषों के  खत्म होने के बाद ही खाना,
अडजस्ट करना सीखाना,
आज्ञाकारी बनाना, 
चुप्पी साधना सीखना,
ज़ोर से ना बोलने, हँसने और चलने पर रोक लगाना,
मधुर स्वर की  एक औरत के “जीवन में  प्रयोजन समझना”,
पढ़ाई  के साथ-साथ घर के काम-काज सीखाना,
खेल कूद में भाग लेने से हतोत्साहित करना,

रूढ़िवादी पेशे अपनाने  के लिए दबाव देना और शादी हो जाने के बाद या बच्चे को जन्म देने के बाद  कैरियर छोड़ देने के लिये अप्रत्यक्ष दबाव डालना,  ये सब कुछ माँ या ममतामयी रूपी पारिवारिक संबंध ही सीखाती है।

माँ , पितृसत्तात्मक सोच- विचार धारा बच्चों में बचपन से ही डालना शुरू कर देती हैं क्योंकि माँ ये खुद भी  आंतरिक लिंगवाद का शिकार होती है।

बचपन से लेकर “शादी की उम्र” हो जाने तक लड़की को एक परिपूर्ण औरत में तब्दील करने का भार हमेशा  माँ पर ही होता है, घर गृहस्थी की जिम्मेदारियां सीखाना हमेशा माँ की ही ज़िम्मेदारी मानी जाती है, क्योंकि इन सभी चीज़ों की  अपेक्षा भी हमेशा औरतों से ही बचपन से की जाती है। माँ , पितृसत्तात्मक सोच- विचार धारा बच्चों में बचपन से ही डालना शुरू कर देती हैं क्योंकि माँ ये खुद भी  आंतरिक लिंगवाद का शिकार होती है।

हमारी शिक्षा और समझ  संबंधों और देश-दुनिया के प्रति इतनी तुछ है और हम जेंडर स्टीरियोटाइप नामक दलदल में इतनी बुरी तरह से धस चुके हैं कि हमारे भारतीय समाज के अनुसार एक पिता अपने बच्चों, खास कर अपनी बेटी की परवरिश करने में असक्षम समझा जाता है।  एक  पिता अपनी घर की चार दीवारों से बाहर निकल कर अपने परिवार का पेट पालने वाला/अन्नदाता,  एक मजदूर, परिवार के लिए एक निर्णायक और एक चयनकर्ता के किरदार से बाहर कुछ भी नहीं है, किसी भी किस्म की भावनाओं और सुघड़ता के नाक़ाबिल समझा जाता है।  हम समझते है कि पिता का  बचपन से बेटियों की परवरिश पर प्रभाव पड़ जाने से बेटियां पुरुषों के आचार-विचार अपना कर अपना स्त्रीयत्व ना खो बैठें क्योंकि  ऐसा होना सामाजिक “विकृति” समझी जाती है। लेकिन ये हमारे परिवार का क़ायदा नहीं था। मैने हमेशा अपने पिता को इन सभी सामाजिक सीमाबद्ध किरदारो के बिल्कुल विपरीत ही पाया है। अंत में  मन में बस एक ही सवाल  आता है कि आखिर कब इस देवी-देवताओं की नगरी में स्त्री को सामाजिक  किरदारों से मुक्ति पा कर मनुष्य का किरदार निभाने का मौका मिलेगा।

Apurba is a visual artist. She completed her bachelor’s in arts degree from Jamia Millia Islamia and currently pursuing Masters in anthropology and post graduation diploma in Folklore and culture studies. She is  Pansexual and her  pronouns are she/her. She likes  reading, writing, gardening and prefers chilling  most of the time.

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